खिड़की में चांद

कई अर्से गुजरें हो जैसेआंखों से लम्हें बह गयीं है रात पहरों में, सुब्ह यादो में कटी हैएकटक देखता हूं, बैचैन सा मैं खिड़कियों से झांकता हूं हर पहर मैं कि कहीं तेरा कोई निशां होकोई शक्ल तुम सा परदों में छिपा होकितना शोर हैं, अंजुमन में हवाएं गीत गाती है कान मगर सुनने को... Continue Reading →

बेटियां 🦋

दिन रात के कसरतों सेवो उसकी अनहद हसरतों से तनिक भी थका नहीं, कहीं भीरूका नहींपिता के उंगलियों से छूटकरबिटिया का हाथ यौवन ने कैसे छिना, पिता सेउसके प्रतिबिंब का साथपिता फिर से, भावनाओं में बह गया हैउसे जाने दिया, उड़ने दियाउसके फैसलों में, उसके हां मेंहां किया है मगर मां इतनी लाचार कहांउसमें पिता... Continue Reading →

जो चाहा, जो सोचा

जो रात सजा था ख्वाबों काआंखों में पहरा जिन यादों कासब टूट गए,सब बिखर गयेसफ़र सुहाना लगता था जोसुख का पैमाना लगता था जोसब मिट गए,सब लूट गएजो साथ बसर करते थेसंग रहा करते थेसब छूट गए,सब सिमट गएजो चाहा, जो सोचा जो ख्वाब बुने सब दुःख और दर्द के पर्याय बने।।

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